
दूर जाने पर अक्सर अपने घर-शहर से, अपने संस्कार - संस्कृति - भाषा से मोह ज़्यादा बढ़ जाता है, इसलिए भारत से जिनके तार जुड़े रहे हैं उन्हें हिंदी बोलते या हिंदी के प्रति उनके अनुराग पर आश्चर्य नहीं होता। परन्तु वैसे लोगों से मिलकर ख़ुशी होती है जिनका भारतीय भाषा -, संस्कृति से जुड़ाव बस यूँ ही होता चला गया। दसवें विश्व हिंदी सम्मलेन में मेरी मुलाक़ात हुई एक ऐसी ही हिंदी प्रेमी अथिला कोठलावाला से। अथिला श्रीलंका की रहने वाली हैं। बचपन में हिंदी फिल्मों के गानों के प्रति इनकी दीवानगी ने इन्हें हिंदी सीखने के लिए प्रेरित किया। हिंदी अनुराग की वजह पूछने पर उन्होंने हँसते हुए बताया कि जब मैं अक्षर समझने लगी थी तब "साजन" और "दिल" फिल्मों के गाने गाया करती थी और उन्हें सिंहली में लिखा करती थी। फिर मुझे लगा कि हिंदी सिर्फ मनोरंजन के लिए ही क्यों? क्यों ना उसकी विधिवत शिक्षा ली जाए ? बस हिंदी सिखने के लिए गुरूजी की तलाश शुरू हो गई। प्रारम्भ बेहद मुश्किलों भरा रहा था क्योंकि जिस जगह से वो आती थीं वहाँ कोई भी हिंदी सीखाने वाला नहीं था। उन्होंने "लैंग्वेज स्कूल" में नामांकन लिया, लेकिन वहाँ भी जापानी, फ्रेंच जैसी भाषाएँ सिखाईं जाती थी , लेकिन हिंदी नहीं सिखाई जाती थी। उन्होंने वहा की प्रधानाध्यापिका से हिंदी में परीक्षा देने की आज्ञा मांगी, और बाहर ही हिंदी के शिक्षक को ढूंढ कर हिंदी की पढ़ाई शुरू की। वो हँसते हुए बताई कि हिंदी सिखने के बाद जब उन्होंने सिंहली में लिखे उन शब्दों को पढ़ा जो उन्होंने हिंदी गाने सुनते हुए लिखा करती थी, तो उन्हें बहुत हंसी आई, क्यों वे सारे शब्द बहुत ही गलत थे , क्योंकि तब उनके कान उन्हें सुनने के लिए अभ्यस्त नहीं थे।
भले शुरुआत कठिनाई भरी रही हो लेकिन आज वो श्रीलंका में हिंदी संस्थान चलाती हैं। नए जिज्ञासुओं को हिंदी की शिक्षा देती हैं। उनके छात्रों में अस्सी साल तक के लोग मौजूद हैं। सेवानिवृत्त के बाद अक्सर वे हिंदी फिल्में - गानों में रुचि की वजह से हिंदी सीखना चाहते हैं। वे हिंदी की शिक्षा देने के साथ साथ हिंदी -सिंहली-अंग्रेजी के शब्दकोष निर्माण में भी लगी हैं।
ऐसे लोगों से मिलकर अहसास होता है कि हिंदी को लेकर हमारी चिंता व्यर्थ है। हिंदी जन - जन की प्यारी सदैव बनी रहेगी।
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