शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

हिंदी स्नेही- प्रो.तोमिओ मिज़ोकामी










हिंदी को बढ़ावा देने वालों में प्रो.तोमिओ मिज़ोकामी अंतर्राष्ट्रीय फलक पर बेहद सम्मानित नामों में से एक है। प्रोफेसर मिज़ोकामी जापान के ओसाका विश्वविद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष रह चुके हैं। दसवें विश्व हिंदी सम्मलेन में उनसे हमारी मुलाकात हुई। उन्होंने कई बातें हमसे साझा की। मेरा सबसे पहला सवाल था कि हिंदी से जुड़ाव का कारण क्या रहा ? उन्होंने हँसते हुए बताया - “तब मेरी उम्र १५ साल रही होगी। 'कोबे' जहां मैं रहता था वहाँ ढेर सारे प्रवासी भारतीय भी रहते थे। उनकी स्त्रियां साड़ी पहने हुए बेहद खूबसूरत लगती थी। उन्हें देख कर उनकी भाषा के प्रति एक आकर्षण हुआ। उसके बाद एक कार्टून पत्रिका थी। उसने युद्ध के समय ब्रिटेन के खिलाफ भारत में विज्ञापन बिखेरा था। उसकी भाषा भी कुछ अलग सी थी। तब उस भाषा को लेकर एक जिज्ञासा उत्पन्न हुई। जिसने बाद में हिंदी भाषा सीखने के लिए प्रेरित किया। इसके अलावा तीसरा और बेहद महत्वपूर्ण कारण था पंडित जवाहरलाल नेहरू का व्यक्तित्व, जो तब के युवकों के लिए रोल मॉडल थे, ये बात और है कि बाद में उनसे मोह भंग हुआ क्योंकि वो अपना भाषण अक्सर अंग्रेजी में देते थे। " तब हिंदी सीखना कितना सरल था इस सवाल पर उन्होंने बताया - "हिंदी सीखना तब बेहद मुश्किल काम था। आज के छात्रों के पास इतनी सहूलियतें है, इंटरनेट है, youtube है। आज तो किताबें भी इंटरनेट पर उपलब्ध हैं, भारत आना जाना बेहद आसान है। हमारे ज़माने में ऐसा नहीं था, ना अच्छी पुस्तकें थी ना अच्छे शिक्षक थे। भारत आना भी बेहद मुश्किल था।" जापान में हिंदी की स्थिति के सवाल पर उन्होंने बताया कि वहाँ हिंदी अध्ययन का इतिहास सौ साल पुराना है। लेकिन तब हिंदी के साथ ही उर्दू भी पढ़ाई जाती थी। वहाँ के पुस्तकालय में आज भी बेहद दुर्लभ किताबें मौजूद हैं। उन्होंने ये भी कहा कि अगर भारत के बाद एशिया में कहीं विश्व हिंदी सम्मलेन आयोजित करने की योजना बनती है तो जापान इसे आयोजित करने में सक्षम है। आज जापान में हिंदी भाषा बेहद लोकप्रिय है, लोग उसे पढ़ रहे हैं, लिख रहे हैं, हिंदी पुस्तकों का जापनी भाषा में अनुवाद भी किया जा रहा है। हिंदी विदेशों में लोकप्रिय हो रही है लेकिन अपने ही देश में, अपने लोगों के बीच उपेक्षित हो रही है। अंग्रेजी जानना ज़रूरी है लेकिन उसका हर जगह इस्तेमाल ज़रूरी नहीं। अंग्रेज़ियत हिंदी के विकास को रोक देगी। आज ज़रूरी है कि हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग किया जाए।"
प्रोफेसर की हिंदी इतनी साफ़ और सधी हुई है कि आँख बंद कर सुनने पर ये कहना मुश्किल है की ये भारत से जुड़े हुए नहीं बल्कि एक जापानी है। उगते सूरज का देश जापान हमेशा से भारत के अहम मित्र देशों में शामिल रहा है] हिंदी के प्रति इस अनुराग को देख कर हमें गौरवान्वित होना चाहिए कि हिंदी हमारी भाषा है।     


शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

स्नेहसूत्र : हिंदी














दूर जाने पर अक्सर अपने घर-शहर से, अपने संस्कार - संस्कृति - भाषा से मोह ज़्यादा बढ़ जाता है, इसलिए भारत से जिनके तार जुड़े रहे हैं उन्हें हिंदी बोलते या हिंदी के प्रति उनके अनुराग पर आश्चर्य नहीं होता। परन्तु वैसे लोगों से मिलकर ख़ुशी होती है जिनका भारतीय भाषा -, संस्कृति से जुड़ाव बस यूँ ही होता चला गया। दसवें विश्व हिंदी सम्मलेन में मेरी मुलाक़ात हुई एक ऐसी ही हिंदी प्रेमी अथिला कोठलावाला से। अथिला श्रीलंका की रहने वाली हैं। बचपन में हिंदी फिल्मों के गानों के प्रति इनकी दीवानगी ने इन्हें हिंदी सीखने के लिए प्रेरित किया। हिंदी अनुराग की वजह पूछने पर उन्होंने हँसते हुए बताया कि जब मैं अक्षर समझने लगी थी तब "साजन" और "दिल" फिल्मों के गाने गाया करती थी और उन्हें सिंहली में लिखा करती थी। फिर मुझे लगा कि हिंदी सिर्फ मनोरंजन के लिए ही क्यों? क्यों ना उसकी विधिवत शिक्षा ली जाए ? बस हिंदी सिखने के लिए गुरूजी की तलाश शुरू हो गई। प्रारम्भ बेहद मुश्किलों भरा रहा था क्योंकि जिस जगह से वो आती थीं वहाँ कोई भी हिंदी सीखाने वाला नहीं था। उन्होंने "लैंग्वेज स्कूल" में नामांकन लिया, लेकिन वहाँ भी जापानी, फ्रेंच जैसी भाषाएँ सिखाईं जाती थी , लेकिन हिंदी नहीं सिखाई जाती थी। उन्होंने वहा की प्रधानाध्यापिका से हिंदी में परीक्षा देने की आज्ञा मांगी, और बाहर ही हिंदी के शिक्षक को ढूंढ कर हिंदी की पढ़ाई शुरू की। वो हँसते हुए बताई कि हिंदी सिखने के बाद जब उन्होंने सिंहली में लिखे उन शब्दों को पढ़ा जो उन्होंने हिंदी गाने सुनते हुए लिखा करती थी, तो उन्हें बहुत हंसी आई, क्यों वे सारे शब्द बहुत ही गलत थे , क्योंकि तब उनके कान उन्हें सुनने के लिए अभ्यस्त नहीं थे।

भले शुरुआत कठिनाई भरी रही हो लेकिन आज वो श्रीलंका में हिंदी संस्थान चलाती हैं। नए जिज्ञासुओं को हिंदी की शिक्षा देती हैं। उनके छात्रों में अस्सी साल तक के लोग मौजूद हैं। सेवानिवृत्त के बाद अक्सर वे हिंदी फिल्में - गानों में रुचि की वजह से हिंदी सीखना चाहते हैं। वे हिंदी की शिक्षा देने के साथ साथ हिंदी -सिंहली-अंग्रेजी के शब्दकोष निर्माण में भी लगी हैं।  

ऐसे लोगों से मिलकर अहसास होता है कि हिंदी को लेकर हमारी चिंता व्यर्थ है। हिंदी जन - जन की प्यारी सदैव बनी रहेगी।